बेरोजगारी डायन खाई जात है।

        आज का युवा है बेचारा बढ़ती बेरोजगारी का मारा, सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रयास भी बहुत है करता और जब ना मिले तो थक हारकर प्राइवेट जॉब के चक्कर ही काटता रहता।

 

         पढ़-पढ़ के पागल होने को हैं तैयार, ताकि सरकारी नौकरी पाकर उसे मिल जाए खुशियां अपार।

 

         सरकारी नौकरी पाने के चक्कर में कोचिंग में पैसा भरने को हैं तैयार, ताकि जब सरकारी नौकरी मिल जाए, तो छोकरी भी मिल जाए सुंदर अपार। 

 

         ना जाने कितने छात्रों ने कोचिंग सेंटर को अमीर बनाया और जो छात्र गरीब थे, उन्हें हालात ने बोझा ढोने को मजबूर बनाया।

 

‌ ना जाने‌‌ कितने इंजीनियरिंग करने वाले छात्र आज चपरासी बनने को मजबूर हैंं, बेरोजगारी की मार ही ऐसी है कि ना चाहते हुए भी आज युवा शिक्षक बनने को मजबूर हैं।

 

           हो जनसंख्या इतनी और जब हो बेरोजगारी अपार, ना हो जब वैकेंसी इतनी और हो जाए कंम्पटीशन अपार, तो ना चाहते हुए भी युवा है वो वैकेंसी भरने को तैयार, जिसमें ना तो उनकी इच्छा है और ना ही खुशियां अपार।

 

          और जब करना पड़े अपनी इच्छा के विरुद्ध काम, तो क्या,मिल पाएगा किसी भी काम का अच्छा परिणाम।

 

          शायद यही कारण है कि ज्यादातर सरकारी स्कूलों में छोटे गांव में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है, क्योंकि ना तो उन्हें उचित शिक्षा और ना ही अच्छा शिक्षक मिल पा रहा है। 

 

          पता नहीं क्यों है? सरकारी नौकरी लेने की है ऐसी होड़, शायद सरकारी नौकरी में दिखती होंगी संभावनाएं अपार।

 

          क्या हो अगर पुस्तकों का बोझ कम कर, दी जाए प्रैक्टिकल ज्ञान और इच्छानुसार स्किल, तो क्या नहीं बनेगी, कुछ नया करने की संभावनाएं अपार।

 

        ना होगी संस्कारों की भरपाई कॉलेज में रामायण पाठ कराने से, ‌ ‌ ना चिल्लाने से ना मारने से , क्या हो अगर मिले संस्कारों की सीख स्कूलों में भी, लगाई जाए क्लास अच्छी सीख से भरी कहानियों की भी, ताकि मिल सके उन्हें समझ अच्छे-बुरे के परख की, औ‌‌र उज्जवल हो भविष्य हमारा और हमारे देश का भी। 

 

           क्यों न दी जाए शिक्षा सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी बोलने और समझने की भी, बनाया जाए अंग्रेजी मीडियम सभी सरकारी स्कूलों को, तो क्या जरूरत पड़ेगी इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी माध्यम में करने की कभी। 

 

          मुझे लगता है कि बच्चों को बेरोजगारी की ट्रेनिंग बचपन से ही दी जा रही है, और शायद इसलिए कापी पुस्तकों से बच्चों के बैग का वजन बढ़ाकर बोझा ढोने की,। शायद इसलिए अब बच्चों की ग्रोथ भी अच्छे से नहीं हो पा रही है, क्योंकि बच्चों के बस्तों के बढ़ते वजन और केवल किताबी ज्ञान के बोझ तले बच्चे दबते चले जा रहे हैं।

            

             तभी तो ना हो रहा मानसिक विकास,ना बढ़ रही बच्चों की ऊंचाई। इसलिए बच्चों से प्रार्थना है कि वह मां को बोलें "काॅम्प्लेन पिलाएं" और बेरोजगार युवा वर्ग से मुझे कहना है "इंजॉय बेरोजगारी!"

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