हम कहाँ से कहाँ जा रहे हैं? सफ़लता की और या बर्बादी की और!

क्या प्राकर्तिक से टकराना सफ़लता है?

 ज़िंदगी की भाग दौड़ में आज हम  बहुत तेज़ी और गति से आगे बढ़ रहे हैं साइंस आज दिन ब दिन तरक़्क़ी पर है हमारा देश हमारा समाज नए माहौल से जुड़ रहा है,

 नई-नई ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों का निर्माण किया जा रहा है। फल,  पेड़-पौदे, सब्ज़ियां जिनके तय्यार होने में काफ़ी समय लगता था अब इस सफ़लत पूर्वक दौर में दवाई और एडवांस टेक्नोलॉजी के ज़रीए से बहुत कम समय में तय्यार की जा रही हैं, कंप्यूटर, मोबाइल फ़ोन, टीवी और सोशल मीडिया और बहुत सी एडवांस चीज़ें आने के बाद हमारी मुश्किलें काफ़ी हद तक आसान हो चुकी हैं, परंतु इतनी सफ़लत पाने के बाद भी हमारे दिल में एक बेचैनी सी रहती है एक अजीब सा डर हमारे दिमाग़ में बैठा हुआ है आख़िर क्यूं?

 कहीँ न कहीँ हम कुछ तो भूल कर और पीछे छोड़ कर आगे बढ़ रहे हैं परन्तु क्या?? वो अपनी संसकृति,कच्चे मकान,खेत-खलयान, पेड़ पौदे, बाग़ और प्राकृतिक चीज़ें जो कि ना के बराबर देखने को मिलती हैं ऐसा लगता है जैसे इन सब चीज़ों से  हमारा कोई रिश्ता ही नहीं था, हम इन सब चीज़ों को काफ़ी पीछे छोड़ते जा रहे हैं जिस का परिणाम हमें आज देखने को मिल रहा है।

आज से ज़्यादा नहीं बस दस साल पहले शूगर,ब्लेड प्रेशर और अस्थमा जैसी बीमारियां काफ़ी कम पाई जाती थी लेकीन आज इन जैसी हज़ारों बीमारियां आ चुकी हैं हर घर में कोई न कोई व्यक्ति इन रोगों से झूझ रहा है।

 पहले की तुलना में बहुत सी नई बीमारियाँ इस समय ऐसी हैं जिनकी वजह से फ़ौरन मौत हो जाना आम सी बात हो गई है।

 हमारे पुराने समय की तुलना में नया समय काफ़ी सफ़लता पूर्वक  है लेकिन ऐसी सफ़लता का क्या फ़ायदा जिस से समाज और प्राकृतिक चीज़ों को हानि पहुंचे, मानव ज़ाति का नुक़सान हो।

 हम देखते थे कि पहले के बच्चे काफ़ी हद तक सेहतमन्द और तेज़ नज़र होते थे ऐनक की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी लेकिन आज 60% से 65% तक बच्चों की आंखों में ऐनक लगे दिखाई पड़ते हैं।

 अगरचे ये ज़्यादा स्मार्ट फ़ोन के इस्तेमाल से ऐसा देखने को मिल रहा है लेकिन फिर भी कारण केवल ये हमारा सफ़लता पूर्वक दौर ही है।

ज़रा सोचिए 

 पहले के लोग ना तो जिम जाते थे और ना ही मशीन का फिल्टर किया हुआ पानी पीते थे फिर भी वो ज़्यादा सेहत मन्द और ख़ुशहाल रहा करते थे उनकी ज़िंदगी ख़ुशियों से भरपूर होती थी और तो और उनकी उम्र भी आज के मनुष्यों से काफ़ी ज़्यादा होती थी बस इस वजह से कि वो क़ुदरती सामान का प्रयोग करते थे जैसे की  ख़ुद की उगाई हुई शुद्ध ताज़ा सब्ज़ियों का सेवन करना, तालाब और नल का शुद्ध पानी पीना,

 और पेड़ पौदे लगा कर उनकी रक्षा करके क़ुदरती माहौल बनाना और इसी वजह से वो ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िंदगी गुज़ारते थे।

 तो पता चला कि क़ुदरत से टकराने से कभी सफ़लता नहीं मिल सकती बल्कि बर्बादियां ही मिलेगी, और इंसानी जीवन और सारे संसार की बर्बादी और तबाहकारी क़ुदरत से टकराने में ही है।

 तो क्यूँ न हम भी अपने पूर्वजों के चले हुए रास्ते पर चल कर यानी क़ुदरत की बनाई हुई चीज़ों से प्रेम करके और उनकी रक्षा करते हुए इस टेक्निकल दौर में आगे बढें ताकि हमें सफ़लता भी मिले और ज़िंदगी बीमारियों से मुक्त और टेंशन फ़्री हो जाए।

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